Tuesday, October 30, 2007

हम पत्रकारिता की दुकान चलाते हैं

दुकान खोलना हर कोई जानता है लेकिन दुकान चलाना सबके बूते की बात नहीं। आपमें एक अच्छे दुकानदार के सारे गुण होने चाहिए। माल बेहतर हो ये जरुरी नहीं लेकिन माल की पैकेजिंग अच्छी होनी चाहिए और सबसे बड़ी बात वो खरीददारों को लुभाए। कुछ ऐसी ही दुकान बनती जा रही अपनी खबरों की ये दुनिया जिसे हम और आप सभ्य भाषा में पत्रकारिता कहते हैं। आइए इस दुकान की कुछ विशेषताओं से हम आपको अवगत करवाते हैं।इस दुका को चलाने वाले तथाकथित बुद्धिजीवी प्राणी होते हैं और लंबी चौड़ी डिग्रियों से ज्यादा इनकी काबिलियत की असली परीक्षा तब होती है जब ये अपने खरीददारों को सबसे ताजा और अनदेखा माल पेश करने की होड़ में जीत हासिल करते हैं। खरीददार बोले तो दर्शक और उससे भी बड़े विज्ञापनदाता। आखिर बात मुनाफे की है और इस मुनाफे का इंडेक्स माना जाता है टीआरपी को। बस इसी बेवफा मेहबूबा को मनाने की कोशिश में ये सारे दुकानदार परेशान रहते हैं। पैसा लगाओ, कैमरामैन को हड़काओ, रिपोर्टर को भगाओ चाहे जैसे भी हो लेकिन विजुअल्स लेकर आओ क्योंकि यही तो असली माल होता है इन दुकानों में जिसे सबसे पहले बेचने की होड़ लगी रहती है। (....जारी है)

Tuesday, September 11, 2007

हम सपने बेचना जानते हैं

खुद को सपनों का सौदागर कहलाने से हमें परहेज नहीं। हम तो ये सोच-सोचकर ही खुश हो जाया करते हैं कि हम सपने बेचना जानते हैं। इस कारोबार में हमारा कोई सानी नहीं क्योंकि हम न सिर्फ सपने दिखाते हैं बल्कि उन्हें पूरा करने की कूव्वत भी रखते हैं। जिन्हें पूरा नहीं करते उनके लिए हम माफी मांग लेते हैं क्योंकि ये आसान रास्ता है अपने पापों के प्रायश्चित करने का।

Friday, September 7, 2007

बहुत निकले मेरे अरमान फिर भी कम निकले

बहुत निकले मेरे अरमान, फिर भी कम निकले...। इलेक्ट्रॉनिक पत्रकारिता में काम कर रहे बंधुओं को अक्सर ये शिकायत रहती है कि उनकी स्टोरी को वो फुटेज या लेंथ नहीं मिली जिसके वे हकदार थे अब उन्हें कौन समझाए कि भाई इस माध्यम की सबसे बड़ी चुनौती तो यही है कि आपको कम-से-कम समय में 'गागर में सागर' भरने की कला आनी चाहिए। वैसे अगर आपकी कहानी बिकने लायक है तो आपको 'राई का पहाड़' बनाने की छूट भी मिल जाती है। आखिर सवाल टीआरपी का है और इसके सामने सारे तर्क फीके पड़ जाते हैं।