मंगलवार, २५ नवम्बर २००८
सोच में तो नहीं पड़ गए जनाब...
लंबे समय बाद टूट गई हड़ताल। शुरु हो गई भागमभाग और फिर से शुरु हो गई कलाकारों के नखरे दिखाने, वक्त की कमी होने का रोना रोने, कैमरा देखकर इठलाने और फिर बड़ी ही अदा के साथ भाव बढ़ाकर बातें करने का सिलसिला। बनावटी दुनिया के बनावटी रंग देखिए टीवी चैनल्स के संग संग। कभी कभी लगता है जिस रुपहले पर्दे की रुपहली दुनिया हमारे देश की आधी से ज्यादा आबादी को लुभाती है वो कितनी बदरंग है। लेकिन जिनको ये पसंद है उनकी पसंद के लिए इसे अपनी पसंद बनाना और फिर इसे उनकी पसंद के लायक बनाकर पेश करना, कितना नापसंद है हम जैसे लोगों को जो हर चीज को तर्क और उपयोगिता की कसौटी पर कसने को मानो बेकरार रहते हैं। सच ही कहा है किसी ने कभी कभी ज्यादा सोचने से चीजें इतनी उलझ जाती है कि उसे सुलझाते सुलझाते पूरी जिंदगी ही गुजर जाती है। लेकिन इस कमबख्त दिमाग का क्या करुं जो कइयों से कमअक्ल होने के बावजूद खुद को ही सबसे ज्यादा अक्लमंद मानकर हर पल कुछ ना कुछ सोचता ही रहता है। कहीं ये सब पढ़कर आप भी तो सोच में नहीं पड़ ...
हरि अनंत हरि कथा अनंता
एक चिड़िया के फुदकने की प्रतीकात्मक लघुकथा लिखकर मैं लंबे समय तक अपनी नौकरी और जिंदगी की दौड़ में इधर उधर निरंतर फुदकती रही या यूं कहूं कि दौड़ती भागती रही। इस बीच ब्लाग जगत पर चर्चाओं के कई मुद्दे गरमाते रहे कुछ अपनी जिंदगी के किस्से सुनाते रहे और कुछ अपनी कविताओं के प्रवाह में पाठकों को बहाते रहे। बहुत कुछ बीत गया लेकिन फिर भी बहुत कुछ शेष है। वो कहते हैं ना कि हरि अनंत हरि कथा अनंता...। बस इसी तरह मानव जीवन में भी हर दिन, हर पल इतना कुछ घटित होता रहता है जिसपर विस्तार से लिखा जाए तो ना जाने कितने महाकाव्य बन जाएंगे जिसे पढ़कर हमारे अनुभवों का संसार और भी समृद्ध हो जाएगा। ब्लागवाणी इसी की तो पहल है ना, क्यों....
शनिवार, १४ जून २००८
एक चिड़िया एक दिन के विश्राम के बाद पुन: अपनी दिनचर्या में लौटी। टांगों में थोड़ा दर्द था लेकिन फिर भी उत्साह से वो इधर उधर फुदक रही थी..फुदक फुदक फुदक....। जोश है तो सब कुछ है...क्यों...आखिर पापी पेट का सवाल था।
मंगलवार, १० जून २००८
महिमा मीडिया की
लिपे-पुते चमकदार चेहरे, जगमगाती पोशाकों में सजे- धजे कुछ नामी-गिरामी लोग, जहां से गुजरे...कैमरे की फ्लैश चमकने लगती है और इनके चेहरे पर खिल जाती है एक लंबी सी.... मुस्कान। मुस्कान बिल्कुल नपी-तुली। इतना कि सामने वाला खुश हो जाए और भीतर का दर्द या कभी कभी ऊब या गुस्सा बाहर ना झांकने पाए। ये है ग्लैमर वर्ल्ड की अद्भुत कला। इस महान कला की विरासत को संभालने वाले भी महान ही होते हैं..। सचमुच...चेहरे पर चेहरा लगाना आसान तो बिल्कुल नहीं और इस ऊपर वाले मुखौटे को ही पब्लिक के सामने सही साबित करते रहने की लगातार कोशिश ही तो इन्हें महान लोगों की क्षेणी में शामिल करता है। लेकिन महान सिर्फ ये लोग ही नहीं...। इन्हें महानता की क्षेणी में पहुंचाने वाले भी तो महान ही होते हैं। मनोरंजन की दुनिया के लाइट... कैमरा...एक्शन के पीछे के लोग और इन सबसे ऊपर ''मीडिया "...जिसके बिना सब सूना सूना ही रहता है। आखिर पब्लिसिटी की होड़ में दौड़ती-हांफती एक्टर्स की पूरी जमात का सरमाएदार तो मीडिया ही है। मीडिया से कन्नी काटने वाले भी जानते हैं कि वक्त आने पर उन्हें भी इनकी शरण में जाना ही पड़ेगा या फिर उन्हें प्रेमपूर्वक बुलावा भेजना पड़ेगा। ऐसे मौकों पर ही तो मीडिया को अपनी अहमियत का अहसास होता है। वरना तो विकल्पों की बढ़ती भीड़ में एक अदद बाइट के लिए गिड़गिड़ाती मीडिया की औकात तो हर आने वाले चैनल के साथ कम होती जा रही है और यही इन एक्टर्स की दिनोंदिन बढ़ती अकड़ की वजह भी बनती जा रही है। लेकिन जब इनकी गाढ़ी कमाई और महत्वाकांक्षा दांव पर हो तो ये बड़ी ही चतुराई से अपना पैंतरा बदल कर अचानक ही बड़े मीडिया फ्रेंडली बन जाते हैं। आखिर यही तो है मीडिया की तथाकथित ताकत। क्या मीडिया ताकतवर है......(इस बात की तलाश फिलहाल जारी है....)
मंगलवार, ३० अक्तूबर २००७
हम पत्रकारिता की दुकान चलाते हैं
दुकान खोलना हर कोई जानता है लेकिन दुकान चलाना सबके बूते की बात नहीं। आपमें एक अच्छे दुकानदार के सारे गुण होने चाहिए। माल बेहतर हो ये जरुरी नहीं लेकिन माल की पैकेजिंग अच्छी होनी चाहिए और सबसे बड़ी बात वो खरीददारों को लुभाए। कुछ ऐसी ही दुकान बनती जा रही अपनी खबरों की ये दुनिया जिसे हम और आप सभ्य भाषा में पत्रकारिता कहते हैं। आइए इस दुकान की कुछ विशेषताओं से हम आपको अवगत करवाते हैं।इस दुका को चलाने वाले तथाकथित बुद्धिजीवी प्राणी होते हैं और लंबी चौड़ी डिग्रियों से ज्यादा इनकी काबिलियत की असली परीक्षा तब होती है जब ये अपने खरीददारों को सबसे ताजा और अनदेखा माल पेश करने की होड़ में जीत हासिल करते हैं। खरीददार बोले तो दर्शक और उससे भी बड़े विज्ञापनदाता। आखिर बात मुनाफे की है और इस मुनाफे का इंडेक्स माना जाता है टीआरपी को। बस इसी बेवफा मेहबूबा को मनाने की कोशिश में ये सारे दुकानदार परेशान रहते हैं। पैसा लगाओ, कैमरामैन को हड़काओ, रिपोर्टर को भगाओ चाहे जैसे भी हो लेकिन विजुअल्स लेकर आओ क्योंकि यही तो असली माल होता है इन दुकानों में जिसे सबसे पहले बेचने की होड़ लगी रहती है। (....जारी है)
मंगलवार, ११ सितम्बर २००७
हम सपने बेचना जानते हैं
खुद को सपनों का सौदागर कहलाने से हमें परहेज नहीं। हम तो ये सोच-सोचकर ही खुश हो जाया करते हैं कि हम सपने बेचना जानते हैं। इस कारोबार में हमारा कोई सानी नहीं क्योंकि हम न सिर्फ सपने दिखाते हैं बल्कि उन्हें पूरा करने की कूव्वत भी रखते हैं। जिन्हें पूरा नहीं करते उनके लिए हम माफी मांग लेते हैं क्योंकि ये आसान रास्ता है अपने पापों के प्रायश्चित करने का।
शुक्रवार, ७ सितम्बर २००७
बहुत निकले मेरे अरमान फिर भी कम निकले
बहुत निकले मेरे अरमान, फिर भी कम निकले...। इलेक्ट्रॉनिक पत्रकारिता में काम कर रहे बंधुओं को अक्सर ये शिकायत रहती है कि उनकी स्टोरी को वो फुटेज या लेंथ नहीं मिली जिसके वे हकदार थे अब उन्हें कौन समझाए कि भाई इस माध्यम की सबसे बड़ी चुनौती तो यही है कि आपको कम-से-कम समय में 'गागर में सागर' भरने की कला आनी चाहिए। वैसे अगर आपकी कहानी बिकने लायक है तो आपको 'राई का पहाड़' बनाने की छूट भी मिल जाती है। आखिर सवाल टीआरपी का है और इसके सामने सारे तर्क फीके पड़ जाते हैं।
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